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मुहब्बत एक नाज है, एक गौरव, एक गरिमा है। जिसे मिल जाती है, वह सम्राट हो जाता है।

प्रेम…
प्रेम एक रहस्य है।
सबसे बड़ा रहस्य..
रहस्यों का रहस्य…
प्रेम से ही बना है अस्तित्व और प्रेम से ही समझ में आता है। प्रेम से ही हम उतरे हैं जगत् में और प्रेम की सीढ़ी से ही हम जगत् के पार जा सकते हैं। प्रेम को जिसने समझा उसने परमात्मा को समझा। और जो प्रेम से वंचित रहा वह परमात्मा की लाख बात करे, बात ही रहेगी, परमात्मा उसके अनुभव में न आ सकेगा। प्रेम परमात्मा को अनुभव करने का द्वार है। प्रेम आंख है।


उस प्रेम को खोजो, जो हिंदू के पार है, मुसलमान के पार है, कुरान के ऊपर जाता है, गीताएं जहां से नीचे अंधेरी खाइयां हो जाती हैं। उन शिखरों को तलाशो। उन्हीं शिखरों पर परमात्मा का निवास है।
कोई मुझसे पूछता था एक दिन : परमात्मा को कहां खोजें? मैंने कहा : प्रेम में। शायद उसने चाहा होगा कि कहूं हिमालय में। शायद उसने चाहा होगा कि कहूं चांदतारों पर। वह कहीं बाहर खोजना चाहता था और परमात्मा भीतर ही खोजा जा सकता है। और भीतर जाने की गैल, उसका नाम प्रेम है।


मुहब्बत एक नाज है——एक गौरव, एक गरिमा है। जिसे मिल जाती है, वह सम्राट हो जाता है। जो उसके बिना है, गरीब है। जो उसके बिना है, बस वही गरीब है——फिर उसके पास कितनी ही संपदा क्यों न हो, सारे जगत् का साम्राज्य ही क्यों न हो। जिसके पास प्रेम नहीं, उसका पात्र खाली है, वह भिखमंगा है।


प्रेम ही एकमात्र चमत्कार है—— एकमात्र जादू ऊ जमीन पर रहनेवालों को आसमांन में रहना सिखा देता है। जमीन पर रहनेवालों को आसमांन में नीड़ बनाने की कला सिखा देता है। जमीन पर जो सरकते हैं, अचानक आकाश में उड़ने लगते हैं। जिन्हें अपने पंखों का पता ही नहीं था, उन्हें पंख मिल जाते हैं। जिनके जीवन में कोई दिशा नहीं थी, दिशा मिल जाती है।
प्रेम में न तो मैं होता है, न तू होता है। जहां मैं तू है, वहां प्रेम नहीं। इसलिए तो झगड़े को हम कहते हैं तूनूर मैं—मैं। झगड़े का मतलब होता है : बहुत तू, बहुत मैं; तूतू मैं—मैं। प्रेम का अर्थ होता है : न तू र न मैं; दोनों गए; दुई गयी; द्वैत गया। फिर जो शेष रह जाता है, वही तो परमात्मा है।
ठीक कहा है जीसस ने कि प्रेम ही परमात्मा है। बहुतों ने परिभाषाएं की हैं परमात्मा की, लेकिन जीसस सब को मात दे गए।
मुहब्बत एक ख्वाब है


और ऐसा ख्वाब कि जिसके समक्ष जीवन की सारी वास्तविकताएं झूठी हो जाती हैं। प्रेम एक सपना है——ऐसा सपना जिसके सामने जिन्हें हमने अब तक सच्चाइयां माना है, वे सब फीकी पड़ जाती हैं। हमारी सच्चाइयां उस सपने के सामने प्रेम सत्य का स्वप्न है।
प्रेम सत्य की आकांक्षा है, अभीप्सा है।

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